| Author | V.K. Singh |
|---|---|
| Binding | Paperback |
| Language | Hindi |
| ISBN | 978-93-6201-287-6 |
| Pages | 682 |
| Publication date | 10-01-2026 |
| Publisher | Setu Prakashan Samuh |
IKKISAVI SADI MEIN MARX AUR MANIFESTO by V.K. Singh
इक्कीसवीं सदी में मार्क्स और मेनिफेस्टो – वी.के. सिंह
यह वह सम्पूर्ण परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य है, जिसमें आज इक्कीसवीं सदी में कम्युनिस्ट/समाजवादी वैचारिकी और व्यवहार की नये सिरे से परख-पड़ताल करते हुए परिपक्व और परिमार्जित करने और इसके लिए एक बार फिर ‘मार्क्स की ओर लौटने’ की जरूरत दुनिया के हर कोने में महसूस की जा रही है। यह किताब इसी दिशा में एक बहुत ही छोटा सा विनम्र प्रयास है जो किसी निष्कर्ष अथवा नयी राह का दावा बिल्कुल भी नहीं करती है। किताब इक्कीसवीं सदी के वृहत्तर प्रगतिशील-भागीदारी जनतान्त्रिक विमर्श की बहुतेरी सम्भव सम्भावनाओं और वैचारिक प्रस्थापनाओं में अपने विनम्र योगदान का प्रयास करती है। किताब दो खण्डों में है : पहले खण्ड में कम्युनिस्ट वैचारिकी के विभिन्न पक्षों और कम्युनिस्ट आन्दोलन की विभिन्न धाराओं को आज के सन्दर्भ में समझने-परखने का प्रयास है। दूसरे खण्ड में इक्कीसवीं सदी के आधिकारिक औपचारिक रूप से बचे रह गये समाजवादी राष्ट्र राज्यों चीन, वियतनाम, क्यूबा, और वेनेजुएला में समाजवाद का क्या कुछ बचा रह गया है, यह खंगालने का प्रयास है। इसके अतिरिक्त मेक्सिको की बीसवीं सदी की जपतिस्ता क्रान्ति से लेकर उसके इक्कीसवीं सदी में चियापा के जपतिस्ता विद्रोह के संस्करण के सन्दर्भ से पूँजीवाद के विकल्प के रूप में कम्युनिस्ट आन्दोलन की लगभग सभी धाराओं की सामुदायिक-स्वायत्त कम्यून की चाहना की भी परख-पड़ताल का प्रयास किया गया है। अन्त में समृद्ध परिपूर्ण मनुष्य और मनुष्यता की इक्कीसवीं सदी की अवधारणा पर अपनी बात रखते हुए यह किताब अपने विराम पर पहुँचती है।
– भूमिका से

















