- Publisher : Rajkamal Prakashan
- Publication date : 1 January 2007
- Edition : First Edition
- Language : Hindi
- Print length : 594 pages
- ISBN-10 : 8126713615
- ISBN-13 : 978-8126713615
- Item Weight : 68 g
- Dimensions : 20 x 14 x 4 cm
Katha Satisar by Chandrakanta
शैव, बौद्ध और इस्लाम की साँझी विरासतों से रची कश्मीर वादी में पहले भी कई कठिन दौर आ चुके हैं । कभी औरंगजेब के समय, तो कभी अफगान-काल में । लेकिन वे दौर आकर गुजर गए । कभी धर्म की रक्षा के लिए, गुरु तेगबहादुर मसीहा बनकर आए, कभी कोई और । तभी ललद्यद और नुन्दऋषि की धरती पर लोग, भिन्न धर्मों के बावजूद, आपसी सौहार्द और समन्वय की लोक-संस्कृति में रचे-बसे जीते रहे! आज वही आतंक, हत्या और निष्कासन का कठिन सिकन्दरी दौर फिर आ गया है, तब सिकंदर के आतंक से वादी में पंडितों के कुल ग्यारह घर बचे रह गए थे । गो कि नई शक्ल में नए कारणों के साथ, पर व्यथा-कथा वही है-मानवीय यन्त्रणा और त्रास की चिरन्तन दुख-गाथा! लोकतन्त्र के इस गरिमामय समय में, स्वर्ग को नरक बनाने के लिए कौन जिम्मेदार हैं? छोटे-बड़े नेताओं, शासकों, बिचौलियों की कौन-सी महत्त्वाकांक्षाओं, कैसी भूलों, असावधानियों और ढुलमुल नीतियों का परिणाम है-आज का रक्त-रँगा कश्मीर? पाकिस्तान तो आतंकवाद के लिए जिम्मेदार है ही, पर हमारे नेतागण समय रहते चेत क्यों न गए? ऐसा क्यों हुआ कि जो औसत कश्मीरी, गुस्से में, ज्यादा-से-ज्यादा, एक-दूसरे पर काँगड़ी उछाल देता था, वही कलिशनिकोव और एके, सैंतालीसों से अपने ही हमवतनों के खून से हाथ रँगने लगा? ऐलान गली जिन्दा है तथा यहाँ वितस्ता बहती है के बाद कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया चर्चित लेखिका चन्द्रकान्ता का बृहद् उपन्यास है-कथा सतीसर लेखिका ने अपने इस नवीनतम उपन्यास में पात्रों के माध्यम से मानवीय अधिकार और अस्मिता से जुड़े प्रश्नों को उठाया है । इस पुस्तक में सन् 1931 से लेकर 2000 के शुरुआती समय के बीच बनते-बिगड़ते कश्मीर की कथा को संवेदना का ऐसा पुट दिया गया है कि सारे पात्र सजीव हो उठते हैं । सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में घटे हादसों से जनजीवन के आपसी रिश्तों पर पड़े प्रभावों का संवेदनात्मक परीक्षण ही नहीं है यह पुस्तक, वर्तमान के जवाबदेह तथ्यों को साहित्य में दर्ज करने से एक ऐतिहासिक दस्तावेज भी बन गई है ।
















