- Publisher : Setu Prakashan Pvt Ltd (2 October 2025)
- Paperback : 551 pages
- ISBN-10 : 9362010305
- ISBN-13 : 978-9362010308
- Item Weight : 180 g
- Dimensions : 28 x 22 x 4 cm
- Packer : Setu Prakashan Pvt Ltd
अनुत्तरित लोग by Kanji Pate
आदिवासी कविता की जब बात की जाती है तो प्रायः मौखिक परम्परा की समृद्ध धरोहर को रेखांकित किया जाता रहा है, जबकि सैकड़ों आदिवासी भाषाओं में आदिवासी जीवन, परिवेश और वैचारिकी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति हुई है। दूसरी बात यह कि आदिवासी कविता को केवल ‘प्रतिरोध का स्वर’ मान लिया जाता रहा है, जबकि उसका केन्द्रीय भाव वैश्विक है, जिसमें मनुष्य, मानवेतर प्राणीजगत और प्रकृति के विविध तत्त्वों के मध्य अपेक्षित व अनिवार्य सामंजस्य को लेकर चिन्ता एवं चिन्तन का समावेश है। हमारे सामने बड़ी चुनौती इस रचनात्मकता को विशेषकर हिन्दी व अँग्रेजी जैसी भाषाओं में अनूदित कर प्रस्तुत करने की है, ताकि कविता के माध्यम से आदिवासी समझ का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार हो सके। प्रस्तुत संचयन ‘भारतीय की समकालीन आदिवासी कविता’ के सम्पादक कानजी पटेल ने लगभग डेढ़ सौ आदिवासी भाषाओं के चार सौ कवियों की पाँच सौ के आसपास कविताएँ इसमें संकलित की हैं। साधुवाद कानजी भाई को, सलाम आदिवासी कविता और उसके वैचारिक सन्देश को ! – हरिराम मीणा यह पृथ्वी के नागरिकों की कविताओं का संग्रह है। ये वे लोग हैं जो शहरों, प्रदेशों या राष्ट्रों के नागरिक होने से कहीं पहले खुद को पृथ्वी का नागरिक मानते हैं। उसी तरह जीवन व्यतीत करते हैं, उसी तरह काव्य रचना करते हैं। ये कविताएँ प्रकृति के प्रति अनुराग और उसे नष्ट करने का प्रयास करने वालों के विरुद्ध चीखें हैं, चेतावनियाँ हैं। मानो पृथ्वी के नागरिक अपनी पृथ्वी को बचाने का आह्वान कर रहे हों। इन कविताओं में प्रार्थना और प्रेम के स्वरों के अलावा अगर प्रतिरोध का स्वर भी है तो उसके मूल में भी करुणा का ही वास है। वे नया संसार बनाने के उपक्रम में नहीं लगे हैं, वे पृथ्वी को, पेड़-पौधों को, पशु-पक्षियों को, मानवीय सम्बन्धों को उनकी खूबसूरती में बचाये रखने का उद्यम कर रहे हैं। इन कविताओं में करुणा की जमीन पर सौन्दर्य का पौधा उगा है, लहलहा रहा है। – उदयन वाजपेयी





















