"मैला आँचल" उपन्यास उत्तर-पूर्व भारत के बिहार राज्य के एक दूर-स्थ ग्राम मैरीगंज को पृष्ठभूमि बनाकर लिखा गया है। यह कहानी उस समय के दौर को दर्शाती है जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव गाँव तक पहुंच रहा था (1946-48)। उपन्यास में ग्रामीणों के जीवन की कठिनाइयाँ, गरीबी, अंधविश्वास, जातिवाद, सामाजिक शोषण और बीमारियाँ उजागर की गई हैं।
कहानी का केंद्रीय पात्र एक युवा चिकित्सक है, जो इस पिछड़े गाँव में सेवा देने आता है और लोगों के अशिक्षा और आधुनिक चिकित्सा के प्रति अविश्वास को दूर करने के लिए संघर्ष करता है। डॉ. प्रशांत बनर्जी गाँव के लोगों की सेवा में जुटे हैं, जो मलेरिया, कालाजार जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं।
इस उपन्यास में गाँव की संस्कृति, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को स्थानीय भाषा, रीति-रिवाज और लोककथाओं के माध्यम से बारीकी से चित्रित किया गया है। यह कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ग्रामीण स्तर पर प्रभाव और स्वतंत्रता के बाद गांव की सामाजिक स्थितियों की आलोचना भी करती है।
महत्त्वपूर्ण विषय
ग्रामीण जीवन की सामाजिक-आर्थिक स्थितियां
अंधविश्वास और परंपरागत मान्यताओं का आधुनिकता से संघर्ष
जाति एवं सामाजिक अन्याय
स्वतंत्रता संग्राम एवं सामान्य जनता पर उसका प्रभाव
मानवीय संबंध एवं सामुदायिक एकता
कहानी अंत में आशावादी संदेश देती है, जो लंबे समय के बाद गाँव के लोगों में जागरूकता और बदलाव के बीज बोती है।
इस उपन्यास को हिंदी साहित्य में आंचलिक उपन्यास के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है और यह 1990 के दशक में दूरदर्शन पर टेलीविज़न सीरीज़ के रूप में भी बनाया गया था।
यह उपन्यास ग्रामीण भारत के जीवन की जटिलताओं और संघर्षों की संवेदनशील कहानी कहता है, जो पाठकों के दिल को छू जाता है।
Maila Anchal (Paperback) by Phanishwarnath Renu (Author)
फणीश्वरनाथ रेणु जन्म : 4 मार्च, 1921; जन्म-स्थान : औराही हिंगना नामक गाँव, ज़िला पूर्णिया (बिहार)। हिन्दी कथा-साहित्य में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण रचनाकार। दमन और शोषण के विरुद्ध आजीवन संघर्ष। राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी। 1942 के भारतीय स्वाधीनता-संग्राम में एक प्रमुख सेनानी। 1950 में नेपाली जनता को राणाशाही के दमन और अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए वहाँ की सशस्त्र क्रान्ति और राजनीति में योगदान। 1952-53 में दीर्घकालीन रोगग्रस्तता। इसके बाद राजनीति की अपेक्षा साहित्य-सृजन की ओर अधिकाधिक झुकाव। 1954 में बहुचर्चित उपन्यास ‘मैला आँचल’ का प्रकाशन। कथा-साहित्य के अतिरिक्त संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज़ आदि विधाओं में भी लिखा। व्यक्ति और कृतिकार, दोनों ही रूपों में अप्रतिम। जीवन की सांध्य वेला में राजनीतिक आन्दोलन से पुनः गहरा जुड़ाव। जे.पी. के साथ पुलिस दमन के शिकार हुए और जेल गए। सत्ता के दमनचक्र के विरोध में ‘पद्मश्री’ लौटा दी। कृतियाँ : ‘मैला आँचल’, ‘परती परिकथा’, ‘दीर्घतपा’, ‘कितने चौराहे’ (उपन्यास); ‘ठुमरी’, ‘अगिनखोर’, ‘आदिम रात्रि की महक’, ‘एक श्रावणी दोपहरी में’, ‘अच्छे आदमी’, ‘सम्पूर्ण कहानियाँ’, ‘प्रतिनिधि कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह); ‘ऋणजल धनजल’, ‘वन तुलसी की गन्ध’, ‘समय की शीला पर’, ‘श्रुत-अश्रुत पूर्व’ (संस्मरण) तथा ‘नेपाली क्रान्ति-कथा’ (रिपोर्ताज़); ‘रेणु रचनावली’ (समग्र)। निधन : 11 अप्रैल, 1977





















