| More Information | |
| Language | Hindi |
|---|---|
| Binding | Hard Back |
| Translator | Not Selected |
| Editor | Not Selected |
| Publication Year | 2018 |
| Edition Year | 2025, Ed. 2nd |
| Pages | 408p |
| Publisher | Rajkamal Prakashan |
Kaun Des Ko Vasi : Venu Ki Diary Author: Suryabala
प्रवासी भारतीय होना भारतीय समाज की महत्त्वाकांक्षा भी है, सपना भी है, कैरियर भी है और सब कुछ मिल जाने के बाद नॉस्टेल्जिया का ड्रामा भी। लेकिन कभी-कभी वह अपने आप को, अपने परिवेश को, अपने देश और समाज को देखने की एक नई दृष्टि का मिल जाना भी होता है। अपनी जन्मभूमि से दूर किसी परायी धरती पर खड़े होकर वे जब अपने आपको और अपने देश को देखते हैं तो वह देखना बिलकुल अलग होता है। भारतभूमि पर पैदा हुए किसी व्यक्ति के लिए यह घटना और भी ज़्यादा मानीख़ेज़ इसलिए हो जाती है कि हम अपनी सामाजिक परम्पराओं, रूढ़ियों और इतिहास की लम्बी गुंजलकों में घिरे और किसी मुल्क के वासी के मुक़ाबले क़तई अलग ढंग से ख़ुद को देखने के आदी होते हैं। उस देखने में आत्मालोचन बहुत कम होता है। वह धुँधलके में घूरते रहने जैसा कुछ होता है। विदेशी क्षितिज से वह धुँधलका बहुत झीना दीखता है और उसके पर बसा अपना देश ज़्यादा साफ़।
इस उपन्यास में अमेरिका-प्रवास में रह रहे वेणु और मेधा ख़ुद को और अपने पीछे छूट गई जन्मभूमि को ऐसे ही देखते हैं। उन्हें अपनी मिट्टी की अबोली कसक प्राय: चुभती रहती है—वे अपने परिवार जनों और उनकी स्मृतियों को सहेजे जब स्वदेश प्रत्यावृत्त होते हैं तो उनकी परिकर-परिधि में आए जन उनके रहन-सहन, आत्मविश्वास से प्रभावित होते हैं, किन्तु वेणु और मेधा के दु:ख, उदासी और अकेलापन नेपथ्य में ही रहते हैं। नई पीढ़ी की आकांक्षाओं में सिर्फ़ और सिर्फ़ बहुत सारा धनोपार्जन ही है ताकि एक बेहतर ज़िन्दगी जी सके, जबकि अमेरिका गए अनेक प्रवासी डॉलर के लिए भीतर ही भीतर कई संग्राम लड़ते हैं। कैरम की गोटियों को छिटका देनेवाली स्थितियाँ हैं, पर निर्मम चाहतें।

















