सम्पादन : हृदय कान्त दीवान | संजय लोढ़ा | अरुण चतुर्वेदी | मनोज राजगुरु (Hriday Kant Dewan, Sanjay Lodha, Arun Chaturvedi, Manoj Rajguru)
ISBN ; 9788131614419
Publication Year ; 2025
Pages ; 272 pages
Binding; Hardback
Sale Territory; World
लोकतंत्र के सैद्धान्तिक और अवधारणात्मक आधार (Loktantra Ke Saiddhantik aur Avadha
आज के संदर्भ में लोकतंत्र की धारणा एक अहम विमर्श के मुद्दे के रूप में उभरी है। हर तरफ यह प्रतीत होता है मानो लोकतंत्र की धारणा को लेकर न सिर्फ विचार स्तर पर वरन् व्यवहार स्तर पर भी अलग-अलग धाराओं में विश्लेषण हो रहा है। इस विश्लेषण को समझने के लिए जहां कुछ स्थानीय परिस्थितियों को समझना होगा वहीं कुछ विशिष्ट मसलों पर गहराई से सोचना होगा।
यह पहला संकलन ‘लोकतंत्र के सैद्धांतिक व अवधारणात्मक आधार’ पर केन्द्रित है। शासन के एक प्रकार के रूप में लोकतंत्र सुनने में जितना सहज प्रतीत होता है, इसके यथार्थ व स्वरूप को समझने का प्रयास उतना ही जटिल और व्यापक है। लोकतंत्र का अर्थ काल, देश और परिस्थितियों के अनुरूप नए आयाम प्राप्त करता रहता है। इस संकलन में लोकतंत्र के विभिन्न संदर्भों को लेकर कुल 27 लेख चार अलग-अलग खण्डों में सम्मिलित किए गए हैं। जहां पहले खण्ड में लोकतंत्र के सैद्धांतिक विश्लेषण को प्रस्तुत किया गया है, वहीं दूसरा खण्ड लोकतंत्र पर विभिन्न विचारकों के दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है। तीसरे खण्ड में भारतीय लोकतंत्र के आधारों की व्याख्या करते हुए लेख सम्मिलित हैं। अंत में चौथा खण्ड भारतीय लोकतंत्र के संबंध में कुछ व्याख्याओं को संबोधित करता है। अतः लोकतंत्र को सैद्धान्तिक अथवा व्यवहारिक आधारों पर समझने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के परिवर्तनशील स्वरूप को ध्यान में रखकर ही चलना होगा। यह संग्रह भारतीय लोकतंत्र पर उपयोगी विमर्श आरम्भ करेगा और इस संकलन की यह कोशिश भी है कि पाठकों को हिन्दी में श्रेष्ठ साहित्य उपलब्ध कराने की दिशा में आगे बढ़ा जाए।

















