सम्पादन : हृदय कान्त दीवान | संजय लोढ़ा | अरुण चतुर्वेदी | मनोज राजगुरु (Hriday Kant Dewan, Sanjay Lodha, Arun Chaturvedi, Manoj Rajguru)
ISBN ; 9788131614518
Publication Year; 2025
Pages; 299 pages
Binding; Hardback
Sale Territory; World
महिला दलित और आदिवासी असमानताएँ (Mahila, Dalit Aur Aadivaasi Asamantaayein (Read
आज के संदर्भ में असमानता एक अहम मुद्दे के रूप में उभरी है। राष्ट्रों, क्षेत्रों, कौमों और व्यक्तियों के बीच असमानताओं के बदलते संदर्भ पर न सिर्फ विचार हो रहा है वरन् कई प्रकार के तथ्य आधारित शोध भी विमर्श को समृद्ध कर रहे हैं।
‘महिला, दलित और आदिवासी असमानताएँ’ उन स्थितियों का आकलन है, जो भारतीय समाज में चली आ रही सामाजिक-आर्थिक विषमताओं का प्रतिबिम्बन हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के होते हुए भी हाशिए पर रह रहे विभिन्न समूह अपनी परम्परागत वंचनाओं से घिरे हैं। अल्पसंख्या और अभिजनवादी राजनीतिक संस्कृति के कारण संविधान के होने के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं निष्प्रभावी हो गई हैं। खण्ड एक में सम्मिलित लेख भारत में महिला विषमताओं से जुड़े आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय संवेदनाओं के प्रश्न और उनके जीवन पर प्रभाव, जिसका अहसास हर जगह होता है, की उदाहरण सहित व्याख्या करते हैं। दूसरा खण्ड दलित विषमताओं पर है, जिसमें दलितों के साथ छुआछूत के मसले का विश्लेषण है। दलित राजनीति के स्वरूप व उनके अपने अधिकारों के बारे में संघर्ष की व्याख्या कई रोचक बातें सामने लाती है। तीसरे खण्ड के चार आलेख भारतीय जनजातियों और अतिपिछड़ों की विषमताओं, उनकी पहचान व उनके प्रति धारणा से जुड़े विमर्श पर हैं। हालांकि ‘आदिवासी’ शब्द पहले से रहने वालों के अर्थ से जुड़ा है लेकिन इस समूह को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाता। कानूनी रूप से ये अभिव्यक्ति अनुसूचित जनजाति के लिए है और यहाँ जिसे ‘जनजाति’ कहा गया है, उनकी विशेषता अलग-थलग वन क्षेत्र में रहने की है और उनके जीवन की निर्भरता वनों पर सर्वाधिक है। दूर-दराज स्थानों पर रहने के कारण ये शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं से वंचित हैं। ये छुआछूत से दूर हैं किन्तु गरीबी से इनका पीछा नहीं छूटा है। बहस मुख्य रूप से यह है कि क्या इनकी अपनी पहचान बनाए रखते हुए इन्हें विकास की प्रक्रिया से जोड़ा जाए या फिर इन्हें मुख्यधारा में सम्मिलित कर लिया जाए। यह संकलन भारत में विशेष असमानताओं से ग्रसित समूहों के बारे में है। बढ़ती असमानताओं के दौर में इन पर सक्रिय कार्य करने की आवश्यकता स्पष्ट उभरती है।

















