सम्पादन : हृदय कान्त दीवान | संजय लोढ़ा | अरुण चतुर्वेदी | मनोज राजगुरु (Hriday Kant Dewan, Sanjay Lodha, Arun Chaturvedi, Manoj Rajguru
ISBN ;; 9788131614495
Publication Year;; 2025
Pages;; 244 pages
Binding;; Hardback
Sale Territory;; World
भारत में असमानताओं के विविध आयाम (Bharat Mein Asamantaon Ke Vividh Aayam) (Reade
आज के संदर्भ में असमानता एक अहम मुद्दे के रूप में उभरी है। राष्ट्रों, क्षेत्रों, कौमों और व्यक्तियों के बीच असमानताओं के बदलते संदर्भ पर न सिर्फ विचार हो रहा है वरन् कई प्रकार के तथ्य आधारित शोध भी विमर्श को समृद्ध कर रहे हैं।
‘भारतीय विषमताओं के विविध आयाम’ भारत की विभिन्न विषमताओं पर चार खण्ड़ों में 23 लेखों के माध्यम से चर्चा करता है। संकलन भारतीय समाज में उपस्थित समूहगत असमानताओं का विश्लेषण और स्वतंत्रता के बाद की कोशिशों का आकलन है। वैसे तो विभेद, असमानता, घौर विपन्नता और इसके दबाव में पीढ़ियों तक चलते रहने से उबरने के उपलब्ध मौके बहुत कम रहे हैं, फिर भी कालांतर में गैर-बराबरी के रूप व उसकी गहनता में फर्क आया है। संकलन के पहले खण्ड में विषमताओं के भारतीय संदर्भ को आठ लेखों में प्रस्तुत व विश्लेषित किया गया है। इनमें विषमता के मुख्य पहलू और उनके आधारों व भारत में स्वतंत्रता के बाद गैर-बराबरी दूर करने के नीतिगत प्रयासों और उनकी सीमाओं की व्याख्या है। दूसरे खण्ड़ के सात लेख शिक्षा के विकास, लोकतंत्र और इन सबके गैर-बराबरी से संबंधों पर केन्द्रित हैं। खण्ड़ तीन, भारत में कुछ समुदायों को बहुसंख्यक समाज से अलग माने जाने के बारे में और इनमें से एक समुदाय के भीतर की जेंडर असमानता के बारे में है। लेख बंधुता के आदर्श की विपरीत दिशा में जा रही यात्रा का जिक्र करते हैं तथा सामुदायिक हिंसा एवं प्रार्थना की स्वतंत्रता के संदर्भ में आ रहे सामाजिक परिवर्तनों पर भी चर्चा करते हैं। संकलन के अंतिम खण्ड चार के लेख भारत में गैर-बराबरी की समस्या का चित्रण कर उनसे निपटने के प्रयासों और क्रियान्वयन में आने वाली समस्याओं, सीमाओं व सम्भावनाओं पर चर्चा करते हैं। विकास और विस्थापन पर विचार से यह स्पष्ट हो जाता है कि जो समूह सामाजिक और आर्थिक वंचनाओं को झेल रहे हैं, वे ही विकास के लिये विस्थापन के शिकार होते रहे हैं।

















